Sunday, August 7, 2011
Saturday, August 6, 2011
जो पल तेरे साथ जीआ
जो पल तेरे साथ जीआ,"वो" पल आज भी,
मेरे साथ जी रहा है-
तनहाई के अश्क पी रहा है,
मेरे दिल का समन्दर,
तेरे साथ जीए पलों की,
प्यास बुझाने की ख़ातिर-
क्योंकि मुझे,
तेरे साथ बिताए पलों की,
सभी मुरादें पूरी करनी हैं,
क्योंकि मुझे,
एहसास है कि,
जो पल तेरे साथ जीआ,
वो पल ही मेरी,
खूबसूरत जिन्दगी है-
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Tuesday, July 26, 2011
पहलू बदलती जिन्दगी
तेज रफ्तार और पहलू बदलती,महंगी जिन्दगी में,
मेरी दादी और बूढ़ी हो गई है,
अब उसे ऊंचा भी सुनाई देने लगा है,
लेकिन अब वह पहले से अधिक,
सवाल पूछने लगी है-
लेकिन मेरे परिवारजन,
उनके सवालों से खीजने लगे हैं,
परेशान होने लगे हैं,
क्योंकि
कुछ सवाल ऎसे होते हैं ,
जिनका जवाब देने के लिए,
कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है-
मंहगी और तेज रफ्तार,
जिन्दगी को ढोते,
मेरे परिवारजनों में,
दादी मां के सवालों का,
जवाब देने लायक,
उर्जा बाकी नहीं रहती,
जिन्दगी से जूझते,
मेरे परिवारजन,
बूढ़ी दादी के सवालों का,
जवाब देने की उर्जा नहीं बचा पाते-
लेकिन मेरी दादी को,
बोलते रहने के लिए,
सवालों के जवाब चाहिए,
मैं जानता हूं,
वे जब सवाल नहीं करेंगी,
तो उनका बोलना,
हमेशा के लिए बन्द हो जाएगा-
Thursday, June 30, 2011
उम्र की सड़क
पिता का साथ बचपन में ही छूटा,तब मै अपने पैरों पर भी,
ठीक से खड़ा नहीं हो सका था-
लेकिन आज मेरा बेटा,
काफी बड़ा हो गया है,
उम्र में और ऊंचाई में,
और अपने पैरों पर भी खड़ा है,
लेकिन मुझे "अहसास" है,
कि वो मेरा बेटा है-
इस लिए आज भी मैं,
अपने बेटे की अंगुली थामे रहता हूं ,
जब वो सड़क पर चलता है,
सड़क को पार करता है.....
वो भले ही कितना भी,
बड़ा हो गया हो,
मेरे लिये तो बच्चा है,
क्यों कि
मैंने जो संघर्ष की ,
सड़क पर जिन हादसों को झेला,
मेरे अनुभव से मैं
अपने बेटे को,
सड़क हादसों से
तो बचा कर रखूं-
( यह कविता मैंने फादर्स-डे पर वर्ष 2011 में लिखी)
Saturday, June 25, 2011
ख़ामोश-तनहाईयां
हर रोज़ की तरहा,
खामोश- तनहाईयों का जंगल,
मेरे साथ, मेरे कमरे में आकर बैठ जाता है-
दिल की खिड़की से,
मिट्टी के टूटे घरोंदे सी,
एक जोड़ी मासूम सी आंखें,किसी की आहट को ढूंढने लगती हैं,
आंगन में यादों का बूढा पेड़ अब,
अपने आप को वट वृक्ष कहने लगा है,
आत्मीयता और अपनेपन के पौधे,
उदासी की चादर ओढे,
किसी गहन चिंता में डूबे हैं,
मानों किसी ने उनकी जड़ों में
जहर घोल दिया हो,
और बसन्त ने उनसे मुंह मोड़ लिया हो-
मासूमियत की चाय,
उबल-उबल कर ,
तुम्हारे बालों की तरहा स्याह हो चुकी है,
उसमें प्यार का दूध डाल कर,
रंग बदलने का प्रयास करता हूं ,
वफ़ा की छलनी में छान कर,
वादों की केतली में डाल कर,,,
उसे आत्मीयता के सूखे फूलों ,
के साथ सजा देता हूं,
आंखों की गहराई के प्याले में भर कर,
डाली से टूट कर निर्जीव हो चुके,
सूखे पत्तों के होठों पर लगा देता हूं,
यह सोच कर कि,
तुम्हारी याद और तुम्हारी कल्पना,
के मिश्रण से बना अमृत,
शायद ख़ामोशियों के चेहरे को,
नया जीवन दे दे--
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Wednesday, May 11, 2011
दोहन की आग
मेरे लिए,
इक हसीन आशियाना,
मग़र स्वार्थ के दानव ने,
इसे दोहन की
आग के हवाले कर दिया-
स्वार्थ के दिमाग़ से
निकले धुंए से,
आसमां बीमार हो गया,
धरती को रोग़ लग गया-
कुल्हाड़ी उस डाली पर चली,
जिस पर इन्सान बैठा था,
उसी घर को आग लगी,
जिसमें मानव रहता था-
बिना डाली के फूल,
खिलाने की कोशिश,
पतझड़ के बिना,
बहार लाने की तमन्ना,
और बिना पंख,
परिन्दे को
उड़ाने के प्रयास ने
फुकुशिमा को पैदा किया-
स्वार्थ के खरपतवार को,
यदि नष्ट नहीं किया गया तो,
पैदा होंगे अनगिनत फुकुशिमा-
Friday, May 6, 2011
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