Tuesday, July 26, 2011

पहलू बदलती जिन्दगी


तेज रफ्तार और पहलू बदलती,
महंगी जिन्दगी में,
मेरी दादी और बूढ़ी हो गई है,
अब उसे ऊंचा भी सुनाई देने लगा है,
लेकिन अब वह पहले से अधिक, 
सवाल पूछने लगी है-


लेकिन मेरे परिवारजन,
उनके सवालों से खीजने लगे हैं,
परेशान होने लगे हैं,
क्योंकि 
कुछ सवाल ऎसे होते हैं ,
जिनका जवाब देने के लिए,
कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है-


मंहगी और तेज रफ्तार,
जिन्दगी को ढोते,
मेरे परिवारजनों में,
दादी मां के सवालों का,
जवाब देने लायक,
उर्जा बाकी नहीं रहती,

जिन्दगी से जूझते,
मेरे परिवारजन,
बूढ़ी दादी के सवालों का,
जवाब देने की उर्जा नहीं बचा पाते-


लेकिन मेरी दादी को,
बोलते रहने के लिए,
सवालों के जवाब चाहिए,
मैं जानता हूं,
वे जब सवाल नहीं करेंगी,
तो उनका बोलना,
हमेशा के लिए बन्द हो जाएगा-
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Thursday, June 30, 2011

उम्र की सड़क


पिता का साथ बचपन में ही छूटा,
तब मै अपने पैरों पर भी,
ठीक से खड़ा नहीं हो सका था-


लेकिन आज मेरा बेटा,
काफी बड़ा हो गया है,
उम्र में और ऊंचाई में,
और अपने पैरों पर भी खड़ा है,
लेकिन मुझे "अहसास" है,
कि वो मेरा बेटा है-


इस लिए आज भी मैं,
अपने बेटे की अंगुली थामे रहता हूं ,
जब वो सड़क पर चलता है,
सड़क को पार करता है.....
वो भले ही कितना भी,
बड़ा हो गया हो,
मेरे लिये तो बच्चा है, 
क्यों कि 
मैंने जो संघर्ष की ,
सड़क पर जिन हादसों को झेला,
मेरे अनुभव से मैं
अपने बेटे को,
सड़क हादसों से 
तो बचा कर रखूं-
( यह कविता मैंने फादर्स-डे पर वर्ष 2011 में लिखी)

Saturday, June 25, 2011

ख़ामोश-तनहाईयां



हर रोज़ की तरहा,
खामोश- तनहाईयों का जंगल, 
मेरे साथ, मेरे कमरे में आकर बैठ जाता है-
दिल की खिड़की से,
मिट्टी के टूटे घरोंदे सी, 
एक जोड़ी मासूम सी आंखें,
किसी की आहट को ढूंढने लगती हैं,


आंगन में यादों का बूढा पेड़ अब,
अपने आप को वट वृक्ष कहने लगा है,
आत्मीयता और अपनेपन के पौधे,
उदासी की चादर ओढे,
किसी गहन चिंता में डूबे हैं,
मानों किसी ने उनकी जड़ों में
जहर घोल दिया हो,
और बसन्त ने उनसे मुंह मोड़ लिया हो-


मासूमियत की चाय,
उबल-उबल कर ,
तुम्हारे बालों की तरहा स्याह हो चुकी है,

उसमें प्यार का दूध डाल कर,
रंग बदलने का प्रयास करता हूं ,
वफ़ा की छलनी में छान कर,
वादों की केतली में डाल कर,,,
उसे आत्मीयता के सूखे फूलों ,
के साथ सजा देता हूं,


आंखों की गहराई के प्याले में भर कर,
डाली से टूट कर निर्जीव हो चुके,
सूखे पत्तों के होठों पर लगा देता हूं,
यह सोच कर कि,
तुम्हारी याद और तुम्हारी कल्पना,  
के मिश्रण से बना अमृत,
शायद ख़ामोशियों के चेहरे को,
नया जीवन दे दे--
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Wednesday, May 11, 2011

दोहन की आग


कुदरत ने तो बनाया था,
मेरे लिए,
इक हसीन आशियाना,
मग़र स्वार्थ के दानव ने,
इसे दोहन की 
आग के हवाले कर दिया-


स्वार्थ के दिमाग़ से
निकले धुंए से,
आसमां बीमार हो गया,
धरती को रोग़ लग गया-


कुल्हाड़ी उस डाली पर चली,
जिस पर इन्सान बैठा था,
उसी घर को आग लगी,
जिसमें मानव रहता था-


बिना डाली के फूल,
खिलाने की कोशिश,
पतझड़ के बिना,
बहार लाने की तमन्ना,
और बिना पंख,
परिन्दे को 
उड़ाने के प्रयास ने
फुकुशिमा को पैदा किया-

स्वार्थ के खरपतवार को,
यदि नष्ट नहीं किया गया तो,
 पैदा होंगे अनगिनत फुकुशिमा-

Friday, May 6, 2011

मेरा सफ़र


माना जिन्दगी सफ़र है,
इस लिए चल रहा हूं,
मंजिल कहां है,
किस बाज़ार में मिलेगी
ये जनता नहीं मैं-


जनता हूं तो बस इतना,
मुझे चलना है
और चलता रहूंगा तो,
शायद मेरी ,
मंजिल भी मेरे साथ चलेगी,
मैं रुकुंगा तो वो भी थम जाएगी।
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Saturday, April 30, 2011

हम परिन्दे




हम तो परिन्दे है


इन्सां के मोहताज़ नहीं
खुद ही ढूंढ लेंगे
अपना दाना पानी
और आशियाना-
मोहताज़ तो इन्सां है
 दूसरे पर आश्रित रह कर
किसी दूसरे में
ढूंढता है
अपना दाना पानी।


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Thursday, April 14, 2011

गुल्लक


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 मेरे शहर के लोग
तरक्की का दावा कर रहे हैं,
आंकड़ों के मकड़ जाल में फंसा रहे हैं,
पहाड़े पढा रहे हैं,
और
कम्प्यूटर की आंख से 
देश की ईज्जत को,
ऊंचा उठा रहे हैं.
लेकिन मेरे घर के सामने ही,
सब्जी मंडी के बाहर,
अपने गले में झोले ‍थैले लटकाए,
अबोध बच्चे,
सब्जी का टोकरा ढोने वाले,
मज़दूरों के पीछे दोड़ते हैं,
टोकरे से गिरे,
सब्जी के टुकड़ों को,
अपने थैलों में सहेजते हैं.
होटल के पिछवाड़े
आठ बरस का रामू
जूठे बर्तन मांजता हुआ
अब भी ऊंघने लगता है
होटल का मलिक
अब भी उसे
डंडे की धमक से जगाता है.
शहर के बाहर
अब भी कचरे के ढेर में
अबोध सिर धंसे हुए हैं
कचरे मैं कुछ ढूंढ रहे हैं.
फिर भी 
तरक्की का दावा करते हैं तो
मान लेता हूं
लेकिन
सब्जी के टोकरे के पीछे
दौड़ने वाले बालक
होटल के पिछवाड़े 
बर्तन धोने वाला रामू
और
कचरे में धंसे अबोध सिर
पहले 
पेट भरने को मेहनत करते थे
अब वे भौतिकता की गुल्लक भरते हैं.
इस गुल्लक को 
भरने की खातिर
अब वे पहले से अधिक तेज
दौड़ते हैं.
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